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Acharya ka jawab जुलाहे की कहानी आचार्य का जवाब julahe ki kahani best hindi kahani,वह एक छोटासा गाँव था। उस गाँव में वीरेंद्र जुलाहे का काम

 आचार्य का जवाब



Acharya ka jawab
जुलाहे की कहानी 
आचार्य का जवाब 
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आचार्य का जवाब


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आचार्य का जवाब




वह एक छोटासा गाँव था। उस गाँव में वीरेंद्र जुलाहे का काम करता था, धीरेंद्र खेती का काम करता था और राजेंद्र मिट्टी का बर्तन बनाने का काम करता था। वे तीनों बचपन से ही गहरे मित्र थे। घर में कोई उत्सव हो या मंदिर में कोई मेला, वे तीनों मित्र एक साथ मनाते थे। वे तीनों अपने धंधे के प्रति संतुष्ट नहीं थे। जब वे तीनों एक साथ मिलते तब वे अपने धंधे के बारे में असंतुष्ट भाव प्रकट करते थे।

जुलाहा वीरेंद्र अपने मित्रों से कहता था, "भगवान ने मुझे क्यों यह धंधा दिया है? रोज-रोज कपास, धागा, करघा इसी में मेरा जीवन पिसता जा रहा है। करघे में काम करते-करते मेरे पैर और हाथ में असहनीय दर्द हो रहे हैं। इस काम में मेरी आँखों की चमक भी कम होती जा रही है। मैं समझता हूँ कि तुम दोनों की स्थिति तो मुझसे अच्छी है।”

यह सुनकर किसान धीरेंद्र ने कहा, "मित्र, तुम्हारे धंधे की समस्या को मैंने समझ लिया। मेरा धंधा तो उससे भी अधिक समस्यापूर्ण है। मैं लोगों को खाने के लिए दाने पैदा करता हूँ। लेकिन उसके लिए कीचड़ में सदा रहता हूँ। भारी हल उठाकर और बैल को हाँककर खेत जोतता हूँ। बीज बोने से लेकर फसल काटने तक मेरी रीड की हड्डी टूट जाती है। कठोर परिश्रम करते करते मेरे हाथ और पैर काट की तरह कठोर बन गये हैं। मैं हमेशा यही सोचता हूँ कि भगवान ने मुझे क्यों ऐसा काम दिया है?"

दोनों मित्रों की बातें सुनकर कुम्हार राजेंद्र ने कहा, "मित्रों! तुम दोनों की बातों से मालूम हो गया कि, तुम लोगों के धंधे में कितनी कठिनाइयाँ हैं। मेरा धंधा भी उतना आसान नहीं है। एक मिट्टी का बर्तन बनाने के लिए अनेक कष्टों को पार करना पड़ता है। चिकनी मिट्टी लाकर बर्तन बनाने योग्य करने के लिए उसमें पानी मिलाकर पाँव से घिसना पड़ता है। तब पाँव में कठोर दर्द होता है। मेरा काम यहाँ तक खतम नहीं होता। उस मिट्टी को चक्र में रखकर घुमाना पड़ता है। तब बर्तन का रूप देने के लिए सावधानी से काम करना पड़ता है। उसके बाद उसे बाहर निकालकर आग में तपना पड़ता है और फिर सूरज के कठोर धूप में सुखाना पड़ता है। ऐसा काम करते-करते मेरे शरीर भर में गंदगी चढ़ गयी। मैं यही सोचता हूँ कि भगवान ने मुझे मिट्टी में ही पिसने का जीवन दिया है।"

 इस प्रकार जब ये तीनों एक साथ मिलते थे तब अपने धंधे के बारे में निराश भाव प्रकट करते थे। एक बार आचार्य नामदेव उस गाँव में आये थे। वे यहाँ के एक सेटे मंदिर में ठहरे थे। गाँव भर के लोग उनके दर्शन के लिए जाते थे। वे तीनों मित्र भी एक साथ उनके दर्शन के लिए गये थे। ये तीनों आचार्य से मिलकर एक स्वर में कहने लगे, महाप्रभु हम तीनो जुलाहे किसान और कुम्हार है। हम अपने धंधे से अधिक परेशान और निराश है। हम जानना चाहते हैं कि इस दुनिया में सदा सुख देने वाला कोई धंधा है? आप बड़े तपस्वी और ज्ञानी है। कृपया आप हमारे संदेह को दूर कीजिए।"

आचार्य ने उन तीनों की बात की गौर से सुना। उसके बाद उन्होंने उनको देखकर सवाल किया, "आप लोगों को अपने धंधे के बगैर और कोई काम करना मालूम है?" तीनों ने एक स्वर में कहा, महान, हम अपने धंधे के सिवाय और कोई काम करना नहीं जानते।

यह सुनकर आचार्य ने उनको देखकर फिर एक सवाल किया, "कपडे, दाने, मिट्टी के बर्तन ये सब यदि लोगों को अपने आप मिल जाते हैं समझो, तब आप लोगों की स्थिति क्या होगी?" तीनों ने उत्तर दिया, "हमारा धंधा रुक जायेगा। हमें अपना जीवन बिताने के लिए भीख मांगकर फिरना पड़ेगा।"

यह सुनकर आचार्य ने उनको देखकर फिर एक सवाल किया, "कपडे, दाने, मिट्टी के बर्तन ये सब यदि लोगों को अपने आप मिल जाते हैं समझो, तब आप लोगों की स्थिति क्या होगी?" तीनों ने उत्तर दिया, "हमारा धंधा रुक जायेगा। हमें अपना जीवन बिताने के लिए भीख माँगकर फिरना पड़ेगा।”

यह सुनकर आचार्य ने उनको समझाते हुए कहा, "इस दुनिया में कोई माँग होने के कारण ही आप लोगों का धंधा चलता है। लोग भी अपनी पूर्ति के लिए आप लोगों को ढूँढकर आते हैं। इसलिए इसे ख्याल में रखकर आप लोगों को अपने धंधे से गौरव का अनुभव होना चाहिए। 

अपने धंधे के प्रति आप लोगों के मन में जो भाव अब है वह बिलकुल अन्याय
आचार्य ने आगे कहा, "लोगों की माँग को तन-मन से जो लोग पूर्ति करते हैं, वे सुख और संतोष का जीवन बिताते हैं। उनको अपने धंधे के प्रति कभी भी दुःख महसूस नहीं होता। इसके बदले जो अपने धंधे में कमी या दुःख देखते हैं, वे सदा निरुत्साह और असंतुष्ट जीवन बिताते हैं।

आचार्य के जवाब से उन तीनों की आँखें खुल पड़ी। अब उन्हें अपने धंधे के प्रति गौरव की भावना महसूस हुई। 

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