चमत्कारी पासा । chamatkari pasa | kahani chamatkari pasa ki | chamatkari pasa story

चमत्कारी पासा । chamatkari pasa | kahani chamatkari pasa ki | chamatkari pasa story,उस फ़रिश्ते ने भास्कर की गरीबी पर तरस खाकर उसे एक चमत्कारी पासा

 चमत्कारी पासा 


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 चमत्कारी पासा 

चमत्कारी पासा ।  chamatkari pasa
चमत्कारी पासा ।  chamatkari pasa  




बहुत पुरानी बात है। भास्कर नाम का एक व्यक्ति था। वह बहुत गरीब था। उसकी कमाई से उसके परिवार को पेट भरकर दो वक्त की रोटी भी नहीं मिल पाती थी। एक दिन उसने गाँव छोड़कर शहर में भीख माँगकर गुज़ारा करने का निर्णय लिया। वह अपनी पत्नी और अपने दो बच्चों को साथ लेकर शहर में चला गया।


उसने शहर में अपनी पत्नी और बच्चों के साथ दिन भर खाक छानी,मगर फिर भी इतनी भीख न मिली कि वे चारों पेट भरकर खाना खा सकें।


अगले दिन सुबह-सुबह वह शहर के एक धनी व्यक्ति के दरवाज़े पर गया और उससे कुछ चावल माँगे। परंतु उस धनी व्यक्ति ने उस पर तरस खाने के बजाय उसका अपमान करके वहाँ से भगा दिया। 



भास्कर अपने मन को मसोस कर वहाँ से चल दिया। वह कुछ दूर ही चला था  कि रास्ते में उसे एक फ़रिश्ता मिला। उस फ़रिश्ते ने भास्कर की गरीबी पर तरस खाकर उसे  एक चमत्कारी पासा दिया और बोला- "जब भी तुम्हें भोजन और जल की ज़रूरत हो, इस पासे को कह देना। यह तुम्हें भोजन और जल दे देगा।" पासा देकर फ़रिश्ता अदृश्य हो गया। भास्कर उस चमत्कारी पासे को लेकर अपने परिवार में पहुंचा। वहाँ पहुंचकर उसने उस पासे से भोजन और जल की माँग की। तुरंत उनके सामने चाँदी की थालियों में विभिन्न प्रकार के स्वादिष्ट पकवान और चाँदी के गिलासों में ही पानी प्रकट हो गया। भूखे परिवार ने भरपेट भोजन किया और उस चमत्कारी पासे को लेकर अपने गाँव लौट आए। अब उन्हें अपने लिए। खाने-पीने की कोई चिंता नहीं रही थी।


एक दिन भास्कर ने अपने पड़ोसी के पास भी वैसा ही एक पासा देखा। उसके पास इस तरह का पासा देखकर उसका हृदय ईर्ष्या से भर उठा। उसने मन ही मन सोचा यदि ऐसा ही अनोखा पासा मेरे पड़ोसी के पास भी है, तो मेरे लिए यह पासा बेकार की वस्तु है। 


उसने अपने पड़ोसी के प्रति अपने मन की जलन अथवा ईर्ष्या से दुखी होकर अपने पास रखे पासे को उठाया और बोला- “मेरी इच्छा यह है कि इस तरह के जितने भी पासे जिनके पास हैं, उन सब में इच्छा पूरी करने की शक्ति तुरंत निष्प्रभावी हो जाए। कोई भी पासा किसी की इच्छा पूरी करने में समर्थ न रहे।"


यह कहकर भास्कर ने अपने पासे की जाँच करने का फैसला किया। वह पासे से बोला "तुरंत स्वादिष्ट पकवान और स्वच्छ जल प्रस्तुत करो।” किंतु उसके बार-बार कहने पर भी उस पासे ने कुछ भी प्रस्तुत नहीं किया। यह देखकर भास्कर बहुत प्रसन्न हुआ।


मूर्ख भास्कर! पड़ोसी से अपनी ईर्ष्या के कारण उसने न केवल अपने परिवार का भोजन पानी छीन लिया, बल्कि उन्हें पहले वाली भुखमरी की स्थिति में ला खड़ा किया। अंत में उसने उस चमत्कारी पासे को जलाने का निर्णय लिया। किंतु इससे पहले कि वह उस पासे को जला पाता, पासा तुरंत गायब हो गया। भास्कर और उसका परिवार फिर से भीख मांगकर गुज़ारा करने पर मजबूर हो गया।

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