दवाओं की दवा आध्यात्मिकता । Dawao ki dawa - आध्यात्मिकता
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दवाओं की दवा आध्यात्मिकता
Hindi dharmik kahani
Dawao ki dawa - आध्यात्मिकता
हिन्दी धार्मिक कहानी
आध्यात्मिकता
दवाओं की दवा आध्यात्मिकता
जीवन एक सुनहरी और सुखमय यात्रा है। इस यात्रा में चलते समय दिक्कत तब आती है जब लोगों में भगवान के प्रति आस्था, विश्वास प्रेम की कमी दिखाई देती है।भारत जैसे आध्यात्मिक देश में आत्म-ज्ञान के प्रति लोगों की अनेक भांतियाँ देख उनकी बुद्धि पर तरस पड़ता है।
एक सुन्दर गीत है, "देख तेरे संसार की हालत क्या हो गई भगवान, कितना बदल गया इन्सान, सूरज ना बदला, बाँद ना बदला, ना बदला आसमान कितना बदल गया इन्सान!" गीत पर गौर करेंगे तो पायेंगे कि सूरज भी वही है, चाँद भी वही है, सितारे भी वही है. आसमान भी वही है, बदला है तो सिर्फ इन्सान। सोचने की बात है कि अगर इन्सान बुरा बन सकता है तो वह अच्छा भी तो बन सकता है। हाँ, बुरा बनने के लिए मेहनत नहीं करनी पड़ती है। जैसे जंगल उगाने के लिए मेहनत नहीं करनी पड़ती लेकिन बगीचा बनाने के लिए मेहनत करनी पड़ती है।
उम्र का प्रमाण-पत्र किसी के पास है क्या ?
अधिकतर लोगों में यह बात घर किये रहती है कि अभी उम्र ही क्या है, जो ज्ञान सीखने में वक्त बर्बाद करें। परंतु विचारणीय बात यह है कि
क्या कोई मनुष्य उम्र का प्रमाण-पत्र लेकर पैदा होता है? क्या ज्ञान और साधना बुढ़ापे का कृत्य है? उस समय तो शरीर निस्तेज हो जाता है, आवाज़ में कंपन आ जाती है, एक पैर संसार और एक पैर श्मशान में लटका नज़र आता है। थोड़ी-सी चेतना लिए जिंदगी चलती-फिरती लाश में बदल जाती है। शरीर दवाइयों पर निर्भर हो जाता है। अतः साधना और ज्ञान का अर्जन बुढापे का कृत्य नहीं है। ज्ञान के लिए घरबार को त्यागने की आवश्यकता भी नहीं है, विकार ज त्यागने की आवश्यकता है। ज्ञान से तो आत्मिक आनंद, श्रद्धा और शान्ति उपजती है इसलिए सभी दवाओं को प दवा 'आध्यात्मिकता' जीवन में ज़रूरी है।

दवाओं की दवा आध्यात्मिकता

वक्त को सीढ़ी बना लो
भगवान कहते हैं- वक्त को सीढ़ी बना लो तो ऊपर चढ़ जायेंगे। आज हर व्यक्ति इस धोखे में जी रहा है कि उसका होना, उसके परिवार के लिए निहायत जरूरी है। यदि गरीब वर्ग का होगा तो सोचेगा कि मेरे न होने. से परिवार टूट जायेगा, पत्नी आत्महत्या कर लेगी, बच्चे सड़कों पर भीख मांगेगे। अगर थोड़ी ऊंची हैसियत वाला होगा तो सोचेगा कि मेरे बिना न चल पायेगा यह समाज में सब झूठे भ्रम है। ऐसे लोगों की स्थिति उस चूहे जैसी है जो मालगाड़ी के नीचे दौड़ता जा रहा था. इस आकार के साथ कि मेरे बिना न चल सकेगी यह मालगाड़ी ।
गलतफ़हमी से बचो
एक कहानी याद आती है एक गाँव में एक झगडालू महिला रहती थी। उसे कोई भी पसंद नहीं करता था। उसका साथी था एक मुर्गा जिसे हमेशा वो अपने साथ रखती थी। गाँव के लोग चाहते थे कि वह गाँव से चली जाए। महिला भी गाँव वालों से नाराज़ थी। आखिर उसने एक दिन गाँव छोड़ने का फैसला कर लिया। जाने से पहले उसने ग्रामीणों से कहा, मैं गाँव छोड़कर जा रही हूँ और अपना मुर्गा साथ लिए जा रही हूँ, इसके बांग देने से गाँव में सवेरा होता था, तुम लोगों को पता तब चलेगा जब गाँव में सदा के लिए अंधेरा हो जायेगा। वह मुर्गे को लेकर दूसरे गाँव में चली गई। अगले दिन उसके मुर्गे ने बांग दी और वहाँ सवेरा हो गया, वह बोली देखा. अब यहाँ सवेरा है लेकिन पिछले गाँव में तो रात हो रहेगी। यह बात पक्की हो गई कि मेरे मुर्गे के बांग देने से ही सवेरा होता है। महिला को बात सुनकर पास ही बैठे बुजुर्ग सन्त बोले, 'बेटी, सर्वथा गलत सोच रही
हो, दिन निकलने पर मुर्गा बाँग देता है, न कि उसके बांग देने से दिन निकलता है। सूर्योदय और सूर्यास्त को प्रकृति संचालित करती है। उस महिला की तरह कुछ लोगों को यह गलतफहमी हो जाती है कि उनके बगैर पत्ता भी हिल नहीं सकता। सच तो यह है कि किसी के बिना, किसी का कोई काम नहीं रुकता। खुद को कर्त्ता मानकर जो जुता हुआ है वह ऐसे ही गलतफहमी में जीएगा, इसके विपरीत करनकरावनहार शिव परमात्मा को सामने रखने वाला यही सोचेगा कि यह सब सृष्टि ड्रामा का खेल है. मैं भी इसमें कलाकार हूँ।
मनमनाभव
उत्तराखण्ड में हुआ हादसा देश तो क्या लेकिन सारे विश्व को स्तब्ध कर देने वाला था। लोगों ने अपने सामने अपनों को काल के गाल में जाते हुए देखा लेकिन कुछ भी ना कर सके। वक्त के रुख को देखकर लगता है कि इससे बड़े हादसों का भी सामना करना पड़ सकता है। इसलिए भगवान कहते है, 'मनमनाभव' अर्थात् सबसे मन हटाकर मुझ परमात्मा में मन लगाओ। तर्क की तलवार एक ओर रखकर एक कदम उजाले की दिशा में रखो। जिसे 'प्रजापिता ब्रह्मा कुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय के माध्यम से परमात्मा बिखरा रहे है इस भूमडल. पर अगर कोई यह सोचे कि वहाँ जाने से स्थूल रूप से लाटरी लग जाये तो | उसके लिए यह जगह अनुकूल नहीं है। यहाँ तो जिसे अपना मान बैठे हो उससे भी मन को प्यारा करना पड़ेगा।
निमित्त भाव से जीओ
धन के बीच जीओ, रहो पर धन अंतःकरण में प्रवेश ना कर पाये ठीक उस बैंक प्रबन्धक की तरह जिसके संरक्षण में अरबों-खरबों रुपये हैं। वो जानता है कि मेरा कुछ भी नहीं है, मैं तो रखवाला हूँ, मुझे मेरी निश्चित तनख्वाह पर निर्भर रहना है, यह सब सरकार का है। इसी प्रकार, निमित्त भाव को अपनाकर मानव भी धन के बीच रहते, संबंधों के बीच रहते सुख का अनुभव कर सकता है। परमपिता परमात्मा शिव अवतरित हुए हैं, चुम्बक की तरह रूहों को अपनी ओर खीचने के लिए चुम्बक लोहे को तब खींचती है जब लोहे पर जंक ना हो। बुराइयों रूपी जंक एक-दो बार के ध्यान से नहीं उतर जाती, इसके लिए धैर्य रख साधना में रत रहना अनिवार्य है। जैसे बीज को अंकुरित होने में अनुकूल हवा, पानी, धूप एवं मिट्टी चाहिए, इसी तरह से योगाभ्यास में एकाग्रता के लिए पाँच विकारों की गठरियाँ उतर जानी चाहिए तभी मनइच्छित फल प्राप्त होगा। वर्तमान समय शिव भगवान विकारों को गठरियाँ उतार रहे हैं। इसलिए कहा जाता है -
वीणा टूट गई तो
गाने से क्या होगा?
गाड़ी छूट गई तो स्टेशन जाने से क्या होगा?
चिड़िया चुग गई खेत तो पछताने से क्या होगा?
अब नहीं तो कब नहीं।
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धन्यवाद
हैव प्रसाद हिन्दी HavePrasad hindi