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 परोपकार


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परोपकार


परोपकार

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। उसे अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए समाज पर निर्भर रहना पड़ता है। परस्पर सहयोग ही सामाजिक जीवन को आधार प्रदान करता है। अपने हित की चिंता न करते हुए दूसरे की भलाई करना ही परोपकार है। वास्तव में परोपकार मानव का सबसे बड़ा धर्म है। परोपकार से ही सुख, शांति, स्नेह, सच्चा त्याग, सहानुभूति और सहनशीलता जैसे गुण मानव में आ सकते हैं जिससे मानव जीवन परिपूर्ण हो सकता है। मानव जीवन की सार्थकता परोपकार की भावना में ही समाहित है। जिस मानव में परोपकार की भावना नहीं होती, वह तो

पशुओं से भी निम्न है। प्रकृति सदैव परोपकार की शिक्षा देती है। वृक्ष अपने फल स्वयं नहीं खाते, नदियाँ अपना जल स्वयं नहीं पीतीं। वृक्ष धूप स्वयं सहकर पथिकों को छाया प्रदान करते हैं। मेघ वर्षा कर सबके लिए अन्न उपजाते हैं।


भारतीय इतिहास और पुराणों में भी परोपकार से संबंधित अनेक कथाएँ मिलती हैं। इनमें महर्षि दधीचि और राजा शिवि इनके सशक्त उदाहरण हैं। महर्षि दधीचि ने तो परोपकार के लिए अपनी अस्थियाँ तक दान कर दी थीं और महाराज शिबि ने अपने शरणागत की रक्षा हेतु अपने शरीर का मांस काटकर दे दिया था।

भारतीय संस्कृति में तो परोपकार को मानव का परम कर्त्तव्य बतलाया गया है। हमारी संस्कृति सबके सुख और कल्याण की कामना करती है। सज्जनों का भी यही मानना है कि केवल परमार्थ हेतु ही मानव शरीर बना है। परंतु आज का मानव बहुत अधिक स्वार्थी हो गया है। उसे केवल अपने सुखों की ही लालसा रहती है। इसी कारण आज वह परोपकार की भावना से दूर होता जा रहा है। उसका हृदय भावनाओं से शून्य होता जा रहा है। यही कारण है कि मानवीय क्रंदन उसके कानों तक नहीं पहुँचता। अतः हमें मानव के मन को सुधारना होगा। हमें मानवीय हित के लाभों को समझाकर मानव को सद्वृत्तियों की ओर लगाना होगा।

इस प्रकार हम कह सकते हैं कि यह विश्व परोपकार के बल पर ही टिका है। मानवता ही मानव का सच्चा आभूषण है। स्वामी विवेकानंद, मदर टेरेसा आदि के जीवन से भी हमें यही शिक्षा मिलती है कि मानव को तन और मन से सदैव दूसरों की भलाई करनी चाहिए। जिस राष्ट्र में परोपकारी मानव होते हैं, वह सदैव उन्नति की ओर अग्रसर रहता है। अत: परोपकार हमें केवल प्रसिद्धि प्राप्त करने के उद्देश्य से न करके कर्तव्य समझकर करना चाहिए।




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