कारागार में श्रीकृष्णावतार। Karagaar mai shreekrishna avatar

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 कारागार में श्रीकृष्णावतार

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कारागार में श्रीकृष्णावतार



कारागार में श्रीकृष्णावतार

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कंस को मगध-नरेश जरासंध तथा अनेक बलशाली राजाओं का सहयोग प्राप्त था। उनकी मदद से वह यदुवंशियोंका नाश करने लगा। यदुवंशी कंसके अत्याचारसे भयभीत होकर दूसरे देशोंमें जाकर बसने लगे। उसने एक-एक करके देवकीके छः पुत्रोंकी हत्या कर डाली। अन्तमें सातवें गर्भके रूपमें भगवान् शेषजी देवकीके गर्भ में थे। भगवान् श्रीकृष्णने अपनी योगमायाको आदेश दिया कि तुम इस समय देवकीके गर्भ में स्थित शेषजीको रोहिणीके गर्भमें स्थापित कर दो।
मैं सम्पूर्ण कलाओंके साथ देवकीका पुत्र बनूँगा और तुम नंदगोपकी पत्नी यशोदाके गर्भसे जन्म लेना। भगवान्‌के आदेशसे योगमायाने वैसा ही किया। कुछ दिनों बाद देवकीके शरीरकी कान्तिसे बन्दीगृह जगमगाने लगा, यह देखकर कंसने सोचा कि इस बार अवश्य ही इसके गर्भमें मेरे प्राणोंके ग्राहक विष्णुने प्रवेश किया है। परन्तु एक तो यह स्त्री है, दूसरे मेरी बहन है और तीसरे गर्भवती है। इसको मारनेसे मेरी कीर्ति नष्ट हो जायगी। इसलिये मैं इसका वध नहीं करूँगा। कंस इतना अधिक दुष्ट था कि वह देवकीको आसानीसे मार सकता था, पर इस समय उसने स्वयं ही क्रूरताका विचार छोड़ दिया। अब वह विष्णुके प्रति वैर ठानकर उनके जन्मकी प्रतीक्षा करने लगा।



आखिर प्रतीक्षा का समय समाप्त हुआ। भगवान्‌ के अवतार की शुभ घड़ी आ गयी। रोहिणीका पावन नक्षत्र था। आकाशके सभी नक्षत्र, तारे, शान्त और सौम्य हो गये। निर्मल आकाशमें तारे जगमगा रहे थे। पृथ्वीकी छटा निराली हो गयी। आज बहुत दिनों बाद पृथ्वीके स्वामी भगवान् उनका भार हरण करनेके लिये अवतार ले रहे थे। इसलिये वह पलक-पाँवड़े बिछाकर

तथा हृदय खोलकर प्रभुके दर्शनके लिये तैयार हो गयीं। जिस समय भगवान्‌के अवतारका अवसर आया स्वर्गमें देवताओंकी दुन्दुभियाँ अपने-आप बज उठीं। किन्नर और गन्धर्व मधुर स्वरमें गाने लगे। अप्सराएँ नृत्य करने लगीं। बड़े-बड़े देवता और ऋषि-मुनि आनन्दसे भरकर पुष्पोंकी वर्षा करने लगे। जलसे भरे हुए बादल गर्जना करने लगे। भाद्रपदके कृष्णपक्षकी घोर अन्धेरी आधीरातको तीनों लोकोंके स्वामी भगवान् श्रीकृष्ण देवकीके गर्भसे प्रकट हुए।

वसुदेवजीने देखा, उनके सामने एक अद्भुत बालक है। उसके नेत्र कमलके समान कोमल और विशाल हैं। वह चार सुन्दर हाथों में शंख, चक्र, गदा और कमल लिये हुए है। उसके - गलेमें कौस्तुभ मणि झिलमिला रही है। उसके श्यामल सुन्दर शरीरपर मनोहर पीताम्बर फहरा रहा है। उसके कमरमें करधनीकी लड़ियाँ लटक रही हैं। आभूषणोंसे सुशोभित बालकके अंग अंगसे अनोखी छटा छिटक रही है। जब वसुदेवने देखा कि मेरे पुत्ररूपमें साक्षात् श्रीहरि आये हैं तो उनके आनन्दका ठिकाना न रहा। उनका रोम-रोम आनन्दसे भर गया। मन-ही-मन उन्होंने ब्राह्मणोंको दस हजार गायें देनेका संकल्प कर डाला। श्रीकृष्णकी अंगकान्तिसे सूतिका गृह जगमगाने लगा। वसुदेवने श्रीहरिके चरणोंमें शीश झुका दिया और स्तुति करने लगे। उनका सारा भय जाता रहा। माता देवकीने कहा- 'प्रभो! पापी कंसको कहीं यह मालूम न हो जाय कि आपका जन्म मेरे गर्भसे हुआ है। आपके लिये मैं कंससे बहुत डर रही हूँ। आप अपने इस रूपको छिपाकर बालक रूप में हो जाइये।




।।।।।जय श्री कृष्णा ।।।।

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