काकासुर की हार | पूतना की हार I kakasur ki haar | putna ki haar | shree krishna leela
काकासुर की हार | पूतना की हार I kakasur ki haar | putna ki haar | shree krishna leela,सारी बातें उनसे बतायीं। कंसके मन्त्री दैत्य होनेके कारण स्वभाव
काकासुरकी हार
काकासुर की हार | पूतना की हार
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काकसुर और पुतना की हार
कंसने दूसरे दिन अपने दरबारमें मन्त्रियोंको बुलवाया और योगमायाकी सारी बातें उनसे बतायीं। कंसके मन्त्री दैत्य होनेके कारण स्वभावसे ही क्रूर थे। वे सब देवताओंके प्रति शत्रुताका भाव रखते थे। अपने स्वामी कंसकी बात सुनकर उन सबने कहा-'यदि आपके शत्रु विष्णुने कहीं और जन्म ले लिया है तो हम दस दिनके भीतर जन्में सभी बच्चोंको आज ही मार डालेंगे। हम आज ही बड़े-बड़े नगरों, छोटे-छोटे गावों, अहीरोंकी बस्तियोंमें और अन्य स्थानों में जितने भी बच्चे पैदा हुए हैं, उन्हें खोजकर मारना शुरू कर देते हैं। आपका शत्रु कहाँ जायगा, एक न एक दिन हमारे हाथों मारा ही जायगा। आपके प्रतापसे हमें एकान्तवासी विष्णु, वनवासी शङ्कर, कायर इन्द्रसे कोई भी भय नहीं है। फिर भी शत्रुको कभी छोटा नहीं समझना चाहिये। इसलिये उसे जड़से उखाड़ फेंकनेके लिये आप हम जैसे सेवकोंको आदेश दीजिये। यदि पहले शत्रुकी उपेक्षा कर दी जाय तो वह पाँव जमा लेता है और बादमें उसे हराना कठिन हो जाता है। अतः उसे शक्तिशाली होनेसे पहले ही समाप्त कर देना चाहिये। देवताओंकी जड़ है विष्णु और वह वहाँ रहता है, जहाँ सनातन धर्म है। सनातन धर्मकी जड़ हैं - वेद, गौ, ब्राह्मण, तपस्या और यज्ञ। हम इनका विनाश कर देंगे तो विष्णु अपने-आप मर जायगा।' एक तो कंसकी बुद्धि वैसे ही बिगड़ी हुई थी, दूसरे उसके मन्त्री उससे भी अधिक दुष्ट थे।
उनकी सलाहमें आकर कंसने आदेश दिया- 'ब्राह्मण, गौ, सन्त तथा दस दिन या उससे अधिक दिनके बच्चे जहाँ भी मिलें- उन्हें तुरन्त मार दिया जाय।' कंसके आदेशसे दुष्ट दैत्य नवजात बच्चोंको जहाँ पाते, वहीं मार देते। यज्ञ, दान, तप, सदाचार कहीं दिखायी नहीं देते। गोकुलमें भी उत्पात शुरू हो गये।
अभी छठी के दिन भगवान्का जातकर्म संस्कार ही हुआ था कि कंसके द्वारा भेजी गयी पूतना श्रीकृष्णको मारनेके लिये नन्दबाबाके घर पहुँची। उसने सुन्दर गोपीका वेष बनाकर श्रीकृष्णको गोदमें उठा लिया और अपने विष लगे स्तनोंका दूध पिलाने लगी। श्रीकृष्णने दूधके साथ उसके प्राणोंको भी खींच लिया और उसे यमलोक भेज दिया।
Kakasur
एक दिनकी बात है, नन्हें-से कन्हाई पालनेमें लेटे हुए अकेले ही कुछ हूँ-हाँ कर रहे थे और अपने हाथ, पैरोंको हिला रहे थे। उसी समय कंसका भेजा हुआ एक दुष्ट राक्षस कौवे का वेष बनाकर उड़ता हुआ वहाँ आ पहुँचा। वह बहुत विकराल था तथा अपने पंखोंको फड़फड़ा रहा था। उसकी चाँच इतनी नुकीली और सख्त थी कि उसके एक ही प्रहारसे पत्थरमें भी छेद हो जाय। वह पहले तो भयङ्कर रूपसे बार-बार श्रीकृष्णको डरानेका प्रयास करने लगा, पर श्रीकृष्ण मुस्कुराते रहे। उनपर काकासुरके भयका कोई असर नहीं पड़ा। फिर वह क्रोधित होकर बालकृष्णको मारनेके लिये झपटा। बालरूप भगवान् श्रीकृष्णने बायें हाथसे कसकर उसके गलेको पकड़ लिया। उसके प्राण छटपटाने लगे। भगवान्ने उसे घुमाकर इतनी जोरसे फेंका कि वह कंसके सभामण्डपमें जा गिरा। बड़ी मुश्किलसे उसे होशमें लाया गया। कंसने घबड़ाकर उससे पूछा- 'तुम्हारी यह दशा किसने की?' काकासुर ने कहा- 'राजन्! जिसने मेरी गर्दन मरोड़कर यहाँ फेंक दिया, वह कोई साधारण बालक नहीं हो सकता। निश्चित ही भगवान् श्रीहरिने अवतार ले लिया है।'
