Dining room vastu shashtra | Dining room kaha hona chahiye | भोजन गृह वास्तु के अनुशार । भोजन गृह कहा बनाए
भोजन गृह
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| Dining room kaha hona chahiye | भोजन गृह वास्तु के अनुशार । भोजन गृह कहा बनाए |
Dining room vastu shashtra | Dining room kaha hona chahiye | भोजन गृह वास्तु के अनुशार । भोजन गृह कहा बनाए ?
भोजन गृह
वास्तुशास्त्र अर्थात् निर्माण अभियान्त्रिकी (Science of Architecture) भारतीय ऋषियों व मनीषियों के अद्वितीय ज्ञान कोष से उद्भूत है । भारतीय प्रचीन वेद-वेदोत्तर साहित्य में इसके फुटकर व विशद् वर्णन उपलब्ध होते है ।
सीमित स्थान उपलब्धता के इस युग में वास्तुशास्त्र १०० प्रतिशत सिद्धान्तों का अनुपालन तो कठिन व दुष्कर कार्य है किन्तु इन सिद्धांतों का यदि ६० से ७० प्रतिशत भी पालन किया जाय ते अनेक कठिनाइयों का निराकरण हो सकता है। अनेक व्यर्थ की आने वाली बाधाओं से बचा जा सकता है। पूर्व निर्मित भवनों में भी कुछ परिवर्तन करके वास्तु के कारण होने वाली असुविधाओं का निराकरण किया जा सकता है।
वास्तु नियमों का पालन इसलिए भी आवश्यक है क्योंकि मानव जीवन में पचास प्रतिशत भाग्य और पचास प्रतिशत वास्तु का प्रभाव होता है भाग्य तो प्रारब्ध से बनता है किन्तु वास्तु को तो हम स्वयं बनाते हैं तो जानबूझ कर हम गलत मार्ग पर चलें तो परिणाम निश्चय ही शुभद नहीं होगा ।
वास्तु-नियम प्रकृति से सामञ्जस्य बैठाते हैं। सृष्टि में पंच महाभूतों का योगदान है- पृथ्वी, जल, अग्नि, आकाश और हवा यहीं सुष्टि के कारण हैं । अतः वास्तु नियम सृष्टि की पंच भूतात्मक व्यवस्था को पीड़ित न करते हुए मानव जीनव का सामंजस्य स्थापित करके उसे शांत शुभ और समृद्ध बनाते हैं।
अगर किसी वजह से भवन में यह गलतियां रह जाती है तो क्या उपाय किया जा सकता है आज कल किसी भवन को तोड़ना आसान नहीं है कही मालिक आड़े आते है तो कही कारपोरेशन के नियम कानून या फिर पड़ोसी । इसके साथ ही अगर आप मकान मे हेर फेर करना चाहते है तो उसकी पाइप लाइने मुश्किल में डालती है। इस तरह की कई समस्याऐं है जिसके चलते आप अपने मकान को वास्तु शास्त्र के नियमों के अनुरूप नहीं ढ़ाल पाते, लेकिन थोड़ी बुद्धि लगाकर आप वास्तुशास्त्र के नियमों को अपने घर लागू कर सकते हैं।
तो चलिये हम अपने इस वास्तु शास्त्र के इस अध्यय मै हम आपको dining room यानी भोजन गृह bhojan griha के वास्तु के बारे मै बताते है ।
भोजन गृह (Dining Room)
(१) वास्तु शास्त्र के नियमानुसार अर्थात विधानके अनुसार वास्तु में भोजन गृह पश्चिम की ओर होना शुभ माना जाता है। वैसे पूर्व या उत्तर दिशा में भी उसका होना अशुभ कारक नहीं है।
(२) दो मंजलि या तीन मंजलि का भवन हो और पाकशाला अर्थात रसोई घर नीचे के मंजिल पर हो तो भोजन कक्ष ऊपरी मंजिल पर नहीं होने चाहिए। सीढ़ी (Stair) चढ़कर उपर तल्ले की ओर अन्न ले जाना कुछ अंशतक अशोभन तथा अयोग्य माना जाता है। इससे अपचय होने का भी भय रहता है एवं अजीर्ण रोग तथा उसी से सम्बन्धित अन्यान्य विकार बढ़ते रहते हैं।
होटेल या उसी प्रकार किसी प्रतिष्ठान में ऊपर दिए गये नियम को पालन करना संभव नहीं है। इस स्थिति में अन्न को ढाँक कर ऊपर के मंजिल पर लिया जाय एवं ऊपर के कमरे में आग्नेय कोण में आहुति देते हुये अन्न ग्रहण किया जाय।
( 3 )भोजन के मेज पर जब घर के महिला पुरुष बच्चे, सब एक साथ भोजन के लिए बैठें, उस समय घर के प्रमुख पुरुष को पूर्व मुख होकर भोजन पर बैठना चाहिए। घर के अन्य लोग-पूर्व, पश्चिम या उत्तर-किसी भी तरफ मुँह करके भोजन कर सकते हैं। सिर्फ दक्षिण मुँह बैठकर भोजन नहीं करना चाहिए।
(४) भोजन शुरू करने से पहले ईश्वर को नमस्कार कर मन में पशु-पक्षी आदि जीवों को स्मरण करते हुए उनके नाम कुछ अन्न देकर फिर भोजन शुरु करना चाहिए।
(५) भोजनशाला के दरवाजा पूर्व-पश्चिम या उत्तर की ओर होना चाहिए।
(६) भोजन मेज (Dining table) गोलाकार, अंडाकार अथवा षटभुजाकार नहीं होना चाहिए। अन्य किसी बेढंगो आकार का भी नहीं होना चाहिए। भोजन मेज दीवार के साथ सटा कर या जुड़ा हुआ नहीं होना चाहिए।
(७) भोजन गृह के ईशान कोण में पानी अवश्य होना चाहिए।
(८) भोजन कक्ष में वाशबेसिन (Wash Basin) आग्नेय या नैऋत कोण में नहीं होना चाहिए। उत्तर दिशा में या पूर्व दिशामें होना चाहिए।
(९) भोजन कक्ष के साथ जुड़ा हुआ बर्तन साफ करने के लिये या कपड़े धोने के लिए कमरा रख सकते हैं, परन्तु स्वच्छता गृह रखना नहीं चाहिए।
(१०) भोजन कक्ष का दरवाजा और वास्तु के प्रमुख प्रवेशद्वार आमने-सामने नहीं होना चाहिए।
(११) भोजन कक्ष में चित्र लगाने से अच्छे और सुन्दर चित्र लगाना चाहिए। इससे वातावरण स्वस्थ रहता है।
(१२) धातुओं की बनी चीजें भोजन कक्ष में कम मात्रा में होनी चाहिए। धातु के बने चीजों से शुभशक्तियों का विनाश होता है। लकड़ी से बनी चीजें रख सकेते हैं।
