सत्संग और भक्ति । satsang aur bhakti । हिन्दी धार्मिक ज्ञान

भक्ति के लिये सत्संग की तरह हाय सररिक और मानसिक सूदढ़ता अवशियक है ।सत्संग भक्ति का एक,satsang aur bhakti । हिन्दी धार्मिक ज्ञान ,सत्संग और भक्ति ,

 सत्संग और भक्ति

मनुष्य के जीवन मै भक्ति एक अहम भुमिका निभाती है । चाहे वो भक्ति इश्वर के प्रती हो,या अपने माता पिता  के  ओर हो । अपनी भक्ति को जताने के लिये मनुष्य अनेको प्रयत्न  करते है , वो सत्संग कराते है,बङे बड़े  पूजा , यज्ञ कराते है । तो चलिये हम अपको सत्संग और भक्ति की कुछ दिलचस्प अथवा याद रह जाने वली बाते बताते है । याद रखे भक्ति के लिये सत्संग की तरह शरीरिक और मानसिक शुद्धता  अवशयक है ।सत्संग भक्ति का एक माध्यम  है, भक्ति नही ।


 सत्संग और भक्ति

 

मनुष्य अपनी समस्याओं को निपटाने में व्यस्त रहता है। समस्याएँ जब बढ़ जाती हैं और व्यस्तता के कारण उनका निष्पादन नहीं हो पाता तो मन बोझिल हो जाता है। समस्याएँ प्रति दिन उठती हैं। इसलिये समस्याओं और व्यस्तताओं के चलते मन का बोझ बढ़ता जाता है। मन में यह चिन्ता बनी रहती है। कि कोई आवश्यक कार्य छूट नहीं जाये। मन में चिंता बनी रहने के बाद भी व्यस्ततावश उसे निपटा पाना संभव नहीं हो पाता। कौन काम पहले करें और कौन काम बाद में कोई आवश्यक काम छूट नहीं जाये तथा छूट गये कामों को कैसे पूरा किया जाये - ऐसी उलझनों में मन तनाव में रहने लगता है। तनावग्रस्त हो जाने के बाद कार्यों की निष्पादन क्षमता कम हो जाती है। इससे वांछित कार्य नहीं हो पाता और तनाव बढ़ता जाता है।




सामान्य कार्यों के निष्पादन में आम आदमी तनावग्रस्त नही होता, या कम होता है। बल्कि भौतिक सुख-सुविधाओं को जुटाने के लिये परेशान रहने की स्थिति में तनाव अधिक बढ़ता है। तनावग्रस्त रहने की आदत बन जाने के बाद कार्यों का बोझ नहीं रहने पर भी कल्पित समस्याओं के बोझ से मनुष्य तनाव से जकड़ा रहने लगता है। दूसरे शब्दों में तनाव में रहना उसकी आदत सी बन जाती है।

सत्संग और भक्ति । satsang aur bhakti
सत्संग और भक्ति । satsang aur bhakti


सत्संग इसी तनाव को कम करता है। जितनी देर तक सत्संग में बैठने का सुअवर मिलता है, उतनी देर तक मन में दूसरी बातें नहीं आ पातीं। लेकिन इसके लिये सत्संग में मन लगाना आवश्यक है। अर्थात् सत्संग में उपस्थिति मात्र तन से ही नहीं, मन से भी होनी चाहिये। तभी इसका सही लाभ मिल पाता है।



ऐसा देख जाता है कि सत्संग का आयोजन प्रायः एक धार्मिक कार्यक्रम के रूप में किया जाता है। उसमें धर्म की बातें भी की जाती हैं। बल्कि धर्म की बातें ही सत्संग में अधिक होती हैं। सत्संगकर्ता द्वारा सत्संग के बीच में भजन की कुछ पंक्तियां गायी-गवायी जाती हैं। सत्संग में बैठे हुए लोग कुछ देर के लिये धार्मिक माहौल में आ जाते हैं। उसके बाद सत्संग फिर आगे बढ़ जाता है।


धार्मिक पंक्तियों के गाने-गुनगुनाने और लगातार बैठ कर सुनते रहने के बावजूद सत्संग में शामिल सभी लोगों का धार्मिक होना आवश्यक नहीं है। इसके कई कारण हैं।


 सत्संग में कुछ लोग स्वेच्छा से सीखने-समझने और भक्ति भावना से आते हैं। कुछ लोग अपने मित्रों के साथ आ जाते हैं। कुछ लोग समाज में अपना धार्मिक स्तर बनाने के प्रयास हेतु सत्संग में आते हैं, ताकि वे भी सत्संग में अपनी उपस्थिति की समाज में चर्चा कर सकें। ऐसे लोगों में पुरुष भी हैं. लेकिन महिलाओं की संख्या अधिक है। 

ऐसे ही कुछ लोग सत्संग के दौरान बातचीत करने लगते हैं और दूसरे श्रोताओं को भी बाधा पहुंचाते हैं। लेकिन धीरे-धीरे ऐसे श्रोता भी सत्संग का अनुशासन सीख लेते हैं।

सत्संग सुनने में रोचक लगता है। श्रोता उस रोचकता में तल्लीन हो जाता है। रोचक प्रसंगों के कारण कुछ लोग सत्संग में जाते हैं। किन्तु रोचक प्रसंग में रुचि लेना भक्ति नहीं है, क्योंकि धर्म या धार्मिक कार्य रुचिकर हो सकता है, लेकिन हर रुचिकर कार्य (या प्रसंग) धार्मिक नहीं हो सकता। इस बात को हम इस तरह भी कह सकते हैं कि चूंकि सत्संगी का धार्मिक होना आवश्यक नहीं है, इसलिये सत्संग में जुटने वाली भीड़ धर्म का द्योतक नहीं है।

भक्ति के लिये सत्संग की तरह ही शरीरिक और मानसिक शुद्धता आवश्यक है। जिस तरह मानसिक शुद्धता के लिये सत्संग, स्वाध्याय और ध्यान आवश्यक है, उसी तरह शारीरिक शुद्धता के लिये उपवास और सादगीपूर्ण भोजन आवश्यक है। कुछ लोग पर्व-त्योहार आदि के मौके पर उपवास करते हैं। यह शारीरिक शुद्धि की एक आवश्यक प्रक्रिया है, जिसे हिन्दू धर्म में बहुत प्रमुखता दी गयी है. क्योंकि स्वस्थ और शुद्ध शरीर में ही स्वस्थ और शुद्ध मन  का वास होता है। जैसा कि स्पष्ट है, सत्संग में बैठे हुए सभी लोग भक्त नहीं होते। लेकिन इस बात को स्वीकार करने में किसी को संकोच नहीं होना चाहिये कि सत्संग में जाने रहने वालों में भक्ति भावना बढ़ जाती है। सत्संग में बैठने से मन को इधर-उधर भटकने से रोकने और नई पुरानी बातें सुनने का मौका मिलता है, जिससे मन को शांति मिलती है।

सत्संग भक्ति का एक माध्यम है, भक्ति नहीं हो, सत्संग से मन शांत होता है और शांत मन से किया गया हर कार्य, भले वह भक्ति ही क्यों न हो, सही ढंग से संपादित होता है। शांत मन से सुनी हुई बातों का प्रभाव कारगर होता है। इसलिये सत्संग के प्रति श्रद्धा ही भक्ति है। श्रद्धा और भक्ति से विश्वास बढ़ता है। विश्वास का आत्मविश्वास से गहरा संबंध है। अपने कार्य क्षेत्र में आगे बढ़ने वाला हर व्यक्ति सबसे पहले आत्मविश्वासी होता है। अर्थात् आत्मविश्वास से अपने कार्य क्षेत्र में आगे बढ़ने का सुवसर प्राप्त होता है। कुछ व्यक्तियों में आत्मविश्वास जन्मजात होता है। लेकिन कुछ लोगों में इसका अभाव होता है। जिन व्यक्तियों में आत्मविश्वास का अभाव होता है, उन्हें अपने प्रयासों द्वारा उसे बढ़ाना आवश्यक है। यह कार्य सत्संग बखूबी पूरा करता है। सत्संग का असर हमेशा धनात्मक होता है। सत्संग  करने वाले वक्ता या महात्मा के व्यक्तित्व (एवं कृतित्व) और व्यवहार का श्रोताओं पर पूर्ण असर पड़ता है। 

इसके लिये वक्ता के आचरण की शुद्धता, उनकी व्यवहार कुशलता और भगवान के प्रति उनका समर्पण या भगवान के प्रति उनकी आस्था का होना बहुत आवश्यक है। ऐसा नहीं कि सत्संग किया, थैला लिया और दूसरे सत्संग-मंच की तलाश में निकल पड़े। यह गतिविधि धार्मिक नहीं, व्यवसायिक है। ऐसे पूर्ण व्यवसायिक वक्ताओं का श्रोताओं पर असर भी धार्मिक कम, व्यवसायिक अधिक पड़ता है। धर्म या भक्ति के उत्थान के लिये ऐसे वक्ता उपयुक्त नहीं माने जा सकतें। 

प्रवचनकर्ताओं को शहर में मंचासीन करने की व्यवस्था वहां के व्यवसायियों द्वारा ही अधिकतर किया जाता है। आज के बड़े-बड़े प्रवचनकर्ताओं के साथ उनकी टोली चलती है। वे तरह-तरह की विक्रय-सामग्री साथ लेकर चलते हैं और उन्हें सत्संग स्थल के पास बिक्री हेतु प्रदर्शित करते हैं।

सत्संग को जी वक्ता धर्म और व्यवहार से जोड़ कर देखते हैं, वे भक्ति के लिये उपयुक्त स्थिति बनाते हैं। ऐसे संत सत्संग को दिखावा और व्यापार से अलग रखते हैं। यही कारण है कि ऐसे सत्संग से अनेक व्यक्तियों को लाभ मिलता है। सत्संग में भक्तिहीन व्यक्ति को भी भक्ति में लीन करने की अद्भुत क्षमता होती है। वस्तुतः सत्संग है ही ऐसी चीज कि इसके माध्यम से व्यक्ति के बहुमुखी विकास का मार्ग प्रशस्त हो जाता है।


सत्संगत्वे निस्संगत्वं                           

निस्संगत्वे निर्मोहत्वम् 

निर्मोहत्वे निश्चलतत्वं                             

 निश्चलतत्वे जीवन्मुक्तिः

सज्जनों के सांगत्य से मानसल मोह दूर होता है। इससे सांसारिक बंधनों का मोह ढीला पड़ जाता है। मोह भ्रांति जब दूर होते हैं, तब 'सत्य' पर निश्चल तत्व तय होता है। यही निश्चल तत्व जीवन मुक्ति को प्रदान करता है।


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