गुफाओ का सौंदर्य - हिन्दी कहानी - best hindi kahani
गुफाओ का सौंदर्य
गुफाओ का सौंदर्य
Gufau ka saundarya
गुफाओ का सौंदर्य - हिन्दी कहानी - best hindi kahani
Ajanta ke gufa ke bare mai in hindi
Ajan
गुफाओ का सौंदर्य
गुफाओ का सौंदर्य
Gufau ka saundarya
गुफाओ का सौंदर्य - हिन्दी कहानी - best hindi kahani
Ajanta ke gufa ke bare mai in hindi
गुफाओ का सौंदर्य - हिन्दी कहानी - best hindi kahani
Ajanta ke gufa ke bare mai in hindi
Ajanta ke gufa
Ellora ke gufa
Laghu katha
लघु कथा
Laghu katha on gufa ke sair
Laghu katha on gufa ke sair
गुफाओ का सौंदर्य
सुदामा चाचा को विविध स्थानों पर घूमने का बड़ा शौक है। वे आए दिन किसी न किसी दर्शनीय स्थल की यात्रा करते रहते हैं। यात्रा करके घर लौटने पर वे हम बच्चों को विविध प्रकार की रोचक जानकारी देते हैं।
इस बार हमारे सुदामा चाचा अजंता और एलोरा की गुफ़ाएँ देखकर आए हैं। वहाँ से लौटने के बाद वे दिन भर सोते रहे। रात को खाना खाने के बाद मैं और मेरी बहन निधि उनके पास गए। हमने उनसे अजंता और एलोरा की गुफ़ाओं के बारे में पूछना शुरू किया। वे बहुत खुश हुए। उन्होंने बताया कि आदम काल में मानव प्राकृतिक रूप से बनी गुफ़ाओं में रहता था। उसने गुफ़ाओं को सजाना शुरू किया। मानव सभ्यता के विकास के साथ-साथ विभिन्न गुफ़ाओं का भी विकास हुआ। उसने गुफ़ाओं को विविध चित्रो और मूर्तियों से सजाना प्रारंभ क्या ।
इस बार हमारे सुदामा चाचा अजंता और एलोरा की गुफ़ाएँ देखकर आए हैं। वहाँ से लौटने के बाद वे दिन भर सोते रहे। रात को खाना खाने के बाद मैं और मेरी बहन निधि उनके पास गए। हमने उनसे अजंता और एलोरा की गुफ़ाओं के बारे में पूछना शुरू किया। वे बहुत खुश हुए। उन्होंने बताया कि आदम काल में मानव प्राकृतिक रूप से बनी गुफ़ाओं में रहता था। उसने गुफ़ाओं को सजाना शुरू किया। मानव सभ्यता के विकास के साथ-साथ विभिन्न गुफ़ाओं का भी विकास हुआ। उसने गुफ़ाओं को विविध चित्रो और मूर्तियों से सजाना प्रारंभ क्या ।
भारत मैऐसी अनेक गुफाएं हैं। मध्य प्रदेश में स्थित भीमबेटका की गुफाएँ तो दस हजार साल से भीज्यादा पुरानी हैं।
पर अजंता और एलोरा की गुफाएँ भले ही उतनी प्राचीन नहीं हैं, फिर भी इन गुफ़ाओं का
सौंदर्य अविस्मरणीय है।
“अजंता की गुफ़ाएँ कहाँ है?" मैंने पूछा।
चाचा जी बोले- "बच्चों, ये गुफाएँ महाराष्ट्र के औरंगाबाद नगर से लगभग 100 किलोमीटर दूर अजंता नाम के गाँव में हैं। यहाँ कुल 30 गुफ़ाएँ हैं। उन गुफ़ाओं की खोज सन् 1319 ई० में ब्रिटिश सैनिकों द्वारा की गई थी। ब्रिटिश सैनिक वहाँ शिकार के लिए गए थे और इन गुफ़ाओं को देखकर हैरत में पड़ गए थे। "चाचा जी, इन गुफ़ाओं को
किसने बनवाया था?" मैंने पूछा। "इन गुफ़ाओं को किसने बनवाया यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता। मान्यता है कि इन्हें गुप्त काल में बनवाया गया था। इन्हें ईसा के बाद दूसरी से सातवीं शताब्दी के बीच बनवाया गया था।"
"चाचा जी, इन गुफ़ाओं में ऐसा क्या है जो विश्व भर से लोग इन्हें देखने भारत आते हैं?"
मैंने पूछा।
अजता की गुफ़ाओ को पहाड़ों को काट-काट कर बनाया गया है। जिस पहाड़ मे ये गुफाएँ हैं, वह घोड़े की नाल की भाँति एक किलोमीटर में फैला है। इनको दोवारों और छतों पर सुंदर चित्र बनाए गए हैं। इन चित्रों को वनस्पति के रंगों से बनाया गया है। चित्र बनाने का ढंग बहुत ही विचित्र था। चित्र बनाने से पहले दीवारों पर विशेष प्लस्तर लगाया जाता था। मिट्टी, गाय का गोबर और चावल की भूसी मिलाकर यह प्लास्तर तैयार किया जाता था। इस पर सफेद चुना किया जाता था। फिर रंगों से चित्र बनाए जाते थे। चित्रों को सुरक्षित बनाए रखने के लिए रंगों में सरेस या चावल का मांड मिलाया जाता था। इसी वजह से आज भी ये चित्र दोवा पर सुरक्षित है।
अजंता के इन चित्रों के आधार पर इस तरह के चित्र अजंता शैली के चित्र कहलाते हैं।
इन गुफाओं में सबसे सुंदर एक नंबर की गुफ़ा है। यह पहाड़ के अंदर 120 फुट गहरी है। इस गुफ़ा की दीवारों, छतों और स्तंभों पर अनेक सुंदर चित्र बने हुए हैं। जीवन के विविध रूप दिखाए गए हैं। इनमें पशु-पक्षी, फूल, आदि बने हुए हैं। राजा, भिक्षुक, स्त्री-पुरुष और बुद्ध, आदि के भिन्न-भिन्न भावों को चित्रों के माध्यम से दिखाया गया है।
सोलहवीं गुफा में मर रही राजकुमारी की पीड़ा को दर्शाता एक चित्र बनाया गया है। यह चित्र हृदय में करुणा के भाव उत्पन्न कर देता है। सत्रहवीं गुफ़ा में भी अनेक सुंदर चित्र देखने को मिलते हैं। राजा और सोने के हंस का चित्र सबका मन मोह लेता है।
इतना कहकर चाचाजी ने एक एलबम निकाली और अजंता की गुफ़ाओं के सुंदर रंगीन चित्र हमें दिखाए। सचमुच सभी चित्र बहुत सुंदर थे। "चाचा जी, अब एलोरा के विषय में बताइए।" मैंने पूछा।
चाचाजी, एलोरा के बारे में बताते हुए बोले- "एलोरा की गुफ़ाएँ औरंगाबाद के निकट है। ये औरंगाबाद से 25 किलोमीटर दूर पश्चिम दिशा में स्थित हैं। इन गुफ़ाओं को 'चारानानदरी' पहाड़ियों को काटकर बनाया गया है। यहाँ लगभग 35 गुफ़ाएँ स्थित है। इनमें बौद्ध धर्म को बारह गुफाएँ है। हिंदू धर्म की गुफ़ाएँ तेरह नंबर से उन्तीस नंबर तक हैं। तीस से चौंतीस नंबर
तक की गुफाएँ जैन धर्म की हैं। एलोरा की गुफ़ाओं में भगवान शिव का अत्यंत सुंदर मंदिर है।
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यह कैलाश मंदिर के नाम से प्रसिद्ध है। एलोरा की हिंदू गुफ़ाओं का निर्माण राष्ट्रकूट वंश के राजा दंतिदुर्ग और कृष्णराज द्वितीय ने करवाया था। परंतु जैन धर्म से संबंधित गुफ़ाओं का निर्माण राजा अयोधवर्ष द्वारा करवाया गया, ऐसा माना जाता है।
पर अजंता और एलोरा की गुफाएँ भले ही उतनी प्राचीन नहीं हैं, फिर भी इन गुफ़ाओं का
सौंदर्य अविस्मरणीय है।
“अजंता की गुफ़ाएँ कहाँ है?" मैंने पूछा।
चाचा जी बोले- "बच्चों, ये गुफाएँ महाराष्ट्र के औरंगाबाद नगर से लगभग 100 किलोमीटर दूर अजंता नाम के गाँव में हैं। यहाँ कुल 30 गुफ़ाएँ हैं। उन गुफ़ाओं की खोज सन् 1319 ई० में ब्रिटिश सैनिकों द्वारा की गई थी। ब्रिटिश सैनिक वहाँ शिकार के लिए गए थे और इन गुफ़ाओं को देखकर हैरत में पड़ गए थे। "चाचा जी, इन गुफ़ाओं को
किसने बनवाया था?" मैंने पूछा। "इन गुफ़ाओं को किसने बनवाया यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता। मान्यता है कि इन्हें गुप्त काल में बनवाया गया था। इन्हें ईसा के बाद दूसरी से सातवीं शताब्दी के बीच बनवाया गया था।"
"चाचा जी, इन गुफ़ाओं में ऐसा क्या है जो विश्व भर से लोग इन्हें देखने भारत आते हैं?"
मैंने पूछा।
अजता की गुफ़ाओ को पहाड़ों को काट-काट कर बनाया गया है। जिस पहाड़ मे ये गुफाएँ हैं, वह घोड़े की नाल की भाँति एक किलोमीटर में फैला है। इनको दोवारों और छतों पर सुंदर चित्र बनाए गए हैं। इन चित्रों को वनस्पति के रंगों से बनाया गया है। चित्र बनाने का ढंग बहुत ही विचित्र था। चित्र बनाने से पहले दीवारों पर विशेष प्लस्तर लगाया जाता था। मिट्टी, गाय का गोबर और चावल की भूसी मिलाकर यह प्लास्तर तैयार किया जाता था। इस पर सफेद चुना किया जाता था। फिर रंगों से चित्र बनाए जाते थे। चित्रों को सुरक्षित बनाए रखने के लिए रंगों में सरेस या चावल का मांड मिलाया जाता था। इसी वजह से आज भी ये चित्र दोवा पर सुरक्षित है।
अजंता के इन चित्रों के आधार पर इस तरह के चित्र अजंता शैली के चित्र कहलाते हैं।
इन गुफाओं में सबसे सुंदर एक नंबर की गुफ़ा है। यह पहाड़ के अंदर 120 फुट गहरी है। इस गुफ़ा की दीवारों, छतों और स्तंभों पर अनेक सुंदर चित्र बने हुए हैं। जीवन के विविध रूप दिखाए गए हैं। इनमें पशु-पक्षी, फूल, आदि बने हुए हैं। राजा, भिक्षुक, स्त्री-पुरुष और बुद्ध, आदि के भिन्न-भिन्न भावों को चित्रों के माध्यम से दिखाया गया है।
सोलहवीं गुफा में मर रही राजकुमारी की पीड़ा को दर्शाता एक चित्र बनाया गया है। यह चित्र हृदय में करुणा के भाव उत्पन्न कर देता है। सत्रहवीं गुफ़ा में भी अनेक सुंदर चित्र देखने को मिलते हैं। राजा और सोने के हंस का चित्र सबका मन मोह लेता है।
इतना कहकर चाचाजी ने एक एलबम निकाली और अजंता की गुफ़ाओं के सुंदर रंगीन चित्र हमें दिखाए। सचमुच सभी चित्र बहुत सुंदर थे। "चाचा जी, अब एलोरा के विषय में बताइए।" मैंने पूछा।
चाचाजी, एलोरा के बारे में बताते हुए बोले- "एलोरा की गुफ़ाएँ औरंगाबाद के निकट है। ये औरंगाबाद से 25 किलोमीटर दूर पश्चिम दिशा में स्थित हैं। इन गुफ़ाओं को 'चारानानदरी' पहाड़ियों को काटकर बनाया गया है। यहाँ लगभग 35 गुफ़ाएँ स्थित है। इनमें बौद्ध धर्म को बारह गुफाएँ है। हिंदू धर्म की गुफ़ाएँ तेरह नंबर से उन्तीस नंबर तक हैं। तीस से चौंतीस नंबर
तक की गुफाएँ जैन धर्म की हैं। एलोरा की गुफ़ाओं में भगवान शिव का अत्यंत सुंदर मंदिर है।
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