तप व्दारा पूर्ण सफलता - Dharmik kahani
भगवद्गीता और नौजवान
तप व्दारा पूर्ण सफलता
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नैतिक सिक्षा हिन्दी,tap dwara
भगवद्गीता और नौजवानमुख्य शीर्षक -
तप व्दारा पूर्ण सफलता
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तप व्दारा पूर्ण सफलता
वाहनों को चलाने के लिए इंधन की आवश्यकता होती है, वाहनों के इंजन की क्रियाशील करने के लिए बैटरी की आवश्यकता होती है, एक मनुष्य को तेजी से दौड़ने के लिए ऊर्जा की आवश्यकता होती है। इसी प्रकार पूर्ण सफलता की प्राप्ति के लिए तपस्या की आवश्यकता होती है। सफलता चाहे सामान्य हो या विश्वस्तरीय, दोनों को प्राप्त करने के लिए तपस्या की आवश्यकता होती है। लेकिन वास्तव में तपस्या क्या है? केवल तपस्या के अभाव के कारण ही लोग जीवन के सुनहरे अवसर खो देते हैं। तपस्या करने से शारीरिक थकावट होती है, लेकिन परिणाम स्वरूप तप की कठोरता के अनुपात में ऊर्जा भी उत्पन्न होती है। मृत्यु से छुटकारा पाने के लिए हिरण्यकश्यप नामक राक्षस ने इस हजार वर्षों तक तपस्या की थी। श्रीमद्भागवतम् में इसका वर्णन है। आज भी भारतीय प्रौद्धीगिकी संस्थानों (आई.आई.टी.) में प्रवेश प्राप्त करने के लिए विद्यार्थियों को बहुत तपस्या करने की आवश्यकता होती है। लेकिन वे उसे तपस्या के रूप में नहीं जानते है। उनका सोचना है कि वे कठोर परिश्रम करते हैं, तपस्या नहीं। इसी कारण अंतिम परिणाम की प्राप्ति में उनका विश्वास कम हो जाता है।
भोग तपस्या का विलोम है। अनियंत्रित रूप से मांग करने वाले व्यक्ति का समय केवल मनोरंजन में चला जाता है और निश्चित रूप से उसकी ऊर्जा समाप्त हो जाती है। लेकिन तप करने वाला व्यक्ति अधिक मात्रा में ऊर्जा संचित करता है। जीवन के किसी भी क्षेत्र में विजय पाने के लिए तपस्या की आवश्यकता होती है। वास्तव में तप सफलता प्राप्ति के लिए आवश्यक योग्यता ।
है। अतः विजय प्राप्ति के इच्छुक व्यक्ति को तप के बारे में भगवद्गीता के उपदेश को अवश्य जानना चाहिए। उन्हें इसे समझकर, सीख कर एवं इससे ऊर्जा प्राप्त करके वाँछित सफलता प्राप्त करनी चाहिए।
भगवद्गीता में सत्रहवें अध्याय के चौदहवें, पंद्रहवें एवं सोलहवें श्लोकों में सभी के लाभ के लिए तीन प्रकार के तप बताये गये हैं। विद्यार्थियों एवं युवाओं को अपने प्रयत्नों में सफल होने के लिए इन्हें अवश्य सीखना चाहिए।
“भगवान, ब्राह्मणों, गुरु, माता-पिता की पूजा करना तथा पवित्रता, सरलता, ब्रह्मचर्य और अहिंसा ही शारीरिक तपस्या है।” (भगवद्गीता १७.१४)
"सच्चे, भानेवाले, हितकर तथा अन्यों को क्षुब्ध न करने वाले वाक्य बोलना और वैदिक साहित्य का नियमित पारायण करना यही वाणी की तपस्या है।" (भगवद्गीता: १७.१५)
यह भी पढे:
तथा संतोष सरलता, गम्भीरता, आत्म-संयम एवं जीवन की शुद्धि ये मन की तपस्यायें हैं।" (भगवद्गीता (१७.१६)
अर्थात भगवद्गीता में उपर्युक्त में तीन तपों को करने का सुझाव दिया गया है। ये शारीरिक स्तर पर, वाणी के स्तर पर एवं मन के स्तर पर किये जाने वाले तप हैं। एक कहावत है कि वरिष्ठ व्यक्तियों का सुझाव पीष्टिक आहार की भाँति होता है। वर्तमान समय में सभी लोग वरिष्ठ व्यक्तियों को सम्मान देना भूल गये हैं। इसी कारण सभी लोग वरिष्ठ व्यक्तियों की सेवा से प्राप्त होने वाली अपार शक्ति से वंचित हैं। किसी कार्य के कर्ता द्वारा वरिष्ठों एवं शुभचिन्तकों के प्रति आभार प्रकट करने एवं सधे हृदय से उनकी सेवा करने से उसके अन्दर प्रचुर मात्रा में ऊर्जा का प्रवाह सुनिश्चित हो जाता है।
वाणी को संयमित रखना एक बड़ी तपस्या है। सामान्यतः लोग नकारात्मक बोलने के आदि है जैसे "मुझसे यह नहीं होगा", "यह इण्टरव्यू मेरे लिए कठिन होने वाला है, "मुझे आई.आई.टी. में प्रवेश नहीं मिल सकता है आदि।। ऐसे नकारात्मक शब्द बोलते रहने से अंत में परिणाम भी वही हो जाता है। अतः प्रत्येक व्यक्ति को सदैव सकारात्मक शब्द बोलना सीखना चाहिए, यही वाणी की तपस्या है। शास्त्रों का पठन भी तपस्या है। अन्यों को क्षुब्ध करने वाले कठोर शब्द कभी नहीं बोलने चाहिए। बोलने वाले शब्दों की तपस्या से प्रचुर ऊर्जा मिलती है जिससे सफलता प्राप्त होती ।
वर्तमान समय में मन की तपस्या बहुत महत्वपूर्ण है। व्यर्थ के विचारों से अकारण ही मन को सुमित नहीं करना चाहिए। व्यर्थ की बातें करने से मन लुमित हो जाता है। मैं सफल बनूँगा", "मुझे विजय प्राप्त होगी" और मै स्वछंदता
से प्रसन्न रहूँगा" यह बार-बार कहने से ही उदासी एवं निराशा समाप्त हो जाती है। "भगवद्गीता सफलता का मार्ग है इस दृढ कथन से ही विद्यार्थी भय से मुक्त हो जाते हैं। अतः विद्यार्थियों एवं युवाओं को इन तीन प्रशान के आवश्यक तप द्वारा पूर्ण सफलता प्राप्त करने का सुझाव दिया जाता है। इन तप को पूर्णता से सीखने पर अपने कठिन लक्ष्यों की निश्चित रूप से प्राप्त किया जा सकता है। इससे कोई संदेह नहीं है। निश्चित लक्ष्याला तपस्वी व्यक्ति जीवन के हर क्षेत्र में विजयी होता है और अन्यों के लिए प्रेरणास्त्रोत बन जाता है।
भोग तपस्या का विलोम है। अनियंत्रित रूप से मांग करने वाले व्यक्ति का समय केवल मनोरंजन में चला जाता है और निश्चित रूप से उसकी ऊर्जा समाप्त हो जाती है। लेकिन तप करने वाला व्यक्ति अधिक मात्रा में ऊर्जा संचित करता है। जीवन के किसी भी क्षेत्र में विजय पाने के लिए तपस्या की आवश्यकता होती है। वास्तव में तप सफलता प्राप्ति के लिए आवश्यक योग्यता ।
है। अतः विजय प्राप्ति के इच्छुक व्यक्ति को तप के बारे में भगवद्गीता के उपदेश को अवश्य जानना चाहिए। उन्हें इसे समझकर, सीख कर एवं इससे ऊर्जा प्राप्त करके वाँछित सफलता प्राप्त करनी चाहिए।
भगवद्गीता में सत्रहवें अध्याय के चौदहवें, पंद्रहवें एवं सोलहवें श्लोकों में सभी के लाभ के लिए तीन प्रकार के तप बताये गये हैं। विद्यार्थियों एवं युवाओं को अपने प्रयत्नों में सफल होने के लिए इन्हें अवश्य सीखना चाहिए।
“भगवान, ब्राह्मणों, गुरु, माता-पिता की पूजा करना तथा पवित्रता, सरलता, ब्रह्मचर्य और अहिंसा ही शारीरिक तपस्या है।” (भगवद्गीता १७.१४)
"सच्चे, भानेवाले, हितकर तथा अन्यों को क्षुब्ध न करने वाले वाक्य बोलना और वैदिक साहित्य का नियमित पारायण करना यही वाणी की तपस्या है।" (भगवद्गीता: १७.१५)
यह भी पढे:
तथा संतोष सरलता, गम्भीरता, आत्म-संयम एवं जीवन की शुद्धि ये मन की तपस्यायें हैं।" (भगवद्गीता (१७.१६)
अर्थात भगवद्गीता में उपर्युक्त में तीन तपों को करने का सुझाव दिया गया है। ये शारीरिक स्तर पर, वाणी के स्तर पर एवं मन के स्तर पर किये जाने वाले तप हैं। एक कहावत है कि वरिष्ठ व्यक्तियों का सुझाव पीष्टिक आहार की भाँति होता है। वर्तमान समय में सभी लोग वरिष्ठ व्यक्तियों को सम्मान देना भूल गये हैं। इसी कारण सभी लोग वरिष्ठ व्यक्तियों की सेवा से प्राप्त होने वाली अपार शक्ति से वंचित हैं। किसी कार्य के कर्ता द्वारा वरिष्ठों एवं शुभचिन्तकों के प्रति आभार प्रकट करने एवं सधे हृदय से उनकी सेवा करने से उसके अन्दर प्रचुर मात्रा में ऊर्जा का प्रवाह सुनिश्चित हो जाता है।
वाणी को संयमित रखना एक बड़ी तपस्या है। सामान्यतः लोग नकारात्मक बोलने के आदि है जैसे "मुझसे यह नहीं होगा", "यह इण्टरव्यू मेरे लिए कठिन होने वाला है, "मुझे आई.आई.टी. में प्रवेश नहीं मिल सकता है आदि।। ऐसे नकारात्मक शब्द बोलते रहने से अंत में परिणाम भी वही हो जाता है। अतः प्रत्येक व्यक्ति को सदैव सकारात्मक शब्द बोलना सीखना चाहिए, यही वाणी की तपस्या है। शास्त्रों का पठन भी तपस्या है। अन्यों को क्षुब्ध करने वाले कठोर शब्द कभी नहीं बोलने चाहिए। बोलने वाले शब्दों की तपस्या से प्रचुर ऊर्जा मिलती है जिससे सफलता प्राप्त होती ।
वर्तमान समय में मन की तपस्या बहुत महत्वपूर्ण है। व्यर्थ के विचारों से अकारण ही मन को सुमित नहीं करना चाहिए। व्यर्थ की बातें करने से मन लुमित हो जाता है। मैं सफल बनूँगा", "मुझे विजय प्राप्त होगी" और मै स्वछंदता
से प्रसन्न रहूँगा" यह बार-बार कहने से ही उदासी एवं निराशा समाप्त हो जाती है। "भगवद्गीता सफलता का मार्ग है इस दृढ कथन से ही विद्यार्थी भय से मुक्त हो जाते हैं। अतः विद्यार्थियों एवं युवाओं को इन तीन प्रशान के आवश्यक तप द्वारा पूर्ण सफलता प्राप्त करने का सुझाव दिया जाता है। इन तप को पूर्णता से सीखने पर अपने कठिन लक्ष्यों की निश्चित रूप से प्राप्त किया जा सकता है। इससे कोई संदेह नहीं है। निश्चित लक्ष्याला तपस्वी व्यक्ति जीवन के हर क्षेत्र में विजयी होता है और अन्यों के लिए प्रेरणास्त्रोत बन जाता है।
अपनी राय और सूझाव जरुर वयक्त करे । धन्यवाद
